परिचय :-एलो वेरा, एलोवेरा क्या है? प्रचलित नाम : घीकुवार, ग्वार पाठा, घृतकुमारी, रससार-एलुआ, मुसब्वरअंग्रेजी नाम : एलो, ए बार्बएडनेन्...
परिचय :-एलो वेरा, एलोवेरा क्या है?
प्रचलित नाम : घीकुवार, ग्वार पाठा, घृतकुमारी, रससार-एलुआ, मुसब्वरअंग्रेजी नाम : एलो, ए बार्बएडनेन्सिस मिल
पौध परिचय : घृतकुमारी का पौधा बहुवर्षीय, 30-60 से.मी. ऊँचा होता है। पत्तियों के तने पर सघन कांटे होते हैं, रूपरेखा में गोपुच्छाकार या भालाकार, मोटी, गुदेदार तथा बाहर से पुष्पध्वज निकलता है, जिस पर पीले तथा लाल रंग के पुष्प निकलते हैं।उपयोगी अंग : पत्तियों से प्राप्त लसीला पीला कड़ुआ द्रव्य (एलोएटिक जूस), सफेद गूदा (एलो जेल)।
मुख्य रासायनिक घटक : घृतकुमारी का प्रमुख घटक ‘एल्वायन’ होता है, जिसमें बार्बेल्वायन, आईसोवार्वेल्वायन एवं एलोइमोडिन आदि घटक पाये जाते हैं।
औषधीय गुण एवं उपयोग : घृतकुमारी अल्पमात्र में दीपन, पाचन, कटुपौष्टिक, यकृत उत्तेजक तथा बड़ी मात्रा में विरेचन, कृमिघ्न, रक्तशोधक, आर्त्तजनन, गुण वाली होती है। वर्तमान समय में एलोजेल का सौन्दर्य प्रसाधन में अत्यधिक उपयोग किया जा रहा है, एवं विभिन्न प्रकार के क्रीम, शैम्पू, लोशन, इत्यादि व्यावसायिक उत्पाद बाजार में उपलब्ध हैं।
घृत कुमारी का पौधा बिना तने का या बहुत ही छोटे तने का एक गूदेदार और रसीला पौधा होता है जिसकी लम्बाई ६०-१०० सेंटीमीटर तक होती है। इसका फैलाव नीचे से निकलती शाखाओं द्वारा होता है। इसकी पत्तियां भालाकार, मोटी और मांसल होती हैं जिनका रंग, हरा, हरा-स्लेटी होने के साथ कुछ किस्मों मे पत्ती के ऊपरी और निचली सतह पर सफेद धब्बे होते हैं। पत्ती के किनारों पर की सफेद छोटे दाँतों की एक पंक्ति होती है। गर्मी के मौसम में पीले रंग के फूल उत्पन्न होते हैं।
माना जाता है कि घृत कुमारी मूलत: उत्तरी अफ्रीका का पौधा है और मुख्यत: अल्जीरिया, मोरक्को, ट्यूनीशिया के साथ कैनेरी द्वीप और माडियरा द्वीपों से संबंधित है हालाँकि अब इसे पूरे विश्व मे उगाया जाता है। इस प्रजाति को चीन, भारत, पाकिस्तान और दक्षिणी यूरोप के विभिन्न भागों में सत्रहवीं शताब्दी में लाया गया था। इस प्रजाति को शीतोष्ण और उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में जैसे ऑस्ट्रेलिया, बारबाडोस, बेलीज़, नाइजीरिया, संयुक्त राज्य अमरीका और पैराग्वे मे भी सफलता पूर्वक उगाया जाता है। विश्व में इसकी २७५ प्रजातियाँ पाई जाती हैं।
एलोवेरा 5,000 वर्ष पुरानी रामबाण औषधि है। इसका वनस्पति नाम धृतकुमारी ,ग्वारपाठा है। इसे संजीवनी पौधा भी कहा जाता है। इसकी लगभग 250 उपजातियां हैं जिनमें से कुछ गिनी चुनी ही औषधीय गुणों से परिपूर्ण होती है। उन कुछ प्रजाततियों में से एक है जो सबसे ज्यादा प्रभावशाली है वह है बार्बाडेन्सीस मीलर। हमारे शरीर को 21अमीनोएसिड की जरूरत होतीहै जिनमेंसे 18अमीनोएसिड़ केवल एलोवेरा से ही मिलते है।
एलोवेरा जैल में वो औषधीय तत्व हैं जो खुद से शरीर में नहीं बनते बल्कि एलोवेरा से ही प्राप्त होते हैं जैसे– कुछ अनिवार्य खनिज, 8अनिवार्य अमीनोएसिड,जो शरीर में खुद से नहीं बनते न ही शरीर में जमा होते हैं इस कारण इन तत्वों को निरंतर शरीर को जरूरत रहती है जिसे पूरी करना भी जरूरी है।
एलोवेरा में सेपोनिन नामक तत्व होता है जो शरीर की अंदरूनी सफाई करता है तथा रोगाणु रहित रखने का गुण रखता है।एलोवेरा दुनिया का सबसें बढिया एंटिबाइटिक ,एंटी,सेप्टिक है।
एलोवेरा का विशेष गुण-है कि शरीर के कोमल तत्वों को हानि नहीं पहुंचने देता यदि हानि होती भी है तो उस नुकसान की भरपाई करने में मदद भी करता है।जिन तत्वों से बुढापा जल्दी आता है एलोवेरा ऐसे तत्वों को नष्ट करता है। एलोवेरा हमारे शरीर की छोटी बड़ी नस,ना़डियों की सफाई करता है उनमें नवीन शक्ति तथा स्फूर्ति भरता है। एलोवेरा जैल हर उम्र के लोग इस्तेमाल कर सकते है यह शरीर में जाकर जो भी सिस्टम खराब है वहां काम करता है।इसका कोई साइड़ इफेक्ट भी नहीं होता इसे संजीवनी बूटी भी कहते हैं।

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